कोरबा में बड़ा जमीन घोटाला: रिकॉर्ड में 100 गुना बढ़ाया रकबा, पटवारी सस्पेंड
भू-अभिलेखों में खेल उजागर, राजस्व विभाग फिर सवालों के घेरे में

कोरबा जिले में एक बार फिर जमीन से जुड़ा बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संवेदनशील मसाहती और ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों में इस तरह की हेराफेरी यह संकेत देती है कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं गहरी साठगांठ काम कर रही है।
कागजों में कलम चली और जमीन 100 गुना बढ़ गई

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि महज कुछ हेक्टेयर की जमीन को रिकॉर्ड में सौ गुना तक बढ़ा दिया गया। ग्राम करूमौहा में किए गए इस खेल ने यह साबित कर दिया कि भू-अभिलेखों के साथ किस स्तर तक छेड़छाड़ संभव है।
जांच में खुला बड़ा खेल, खसरा रिकॉर्ड में भारी हेरफेर

तहसीलदार भैंसमा की जांच में सामने आया कि खसरा नंबर 176/1/ख/1 का वास्तविक रकबा 0.016 हेक्टेयर था, जिसे नियमों के विरुद्ध बढ़ाकर 1.600 हेक्टेयर दर्ज कर दिया गया। वहीं खसरा नंबर 84/4 ख में 0.710 हेक्टेयर भूमि को सीधे 71.000 हेक्टेयर कर दिया गया। यह बदलाव न सिर्फ कागजों में बल्कि ऑनलाइन भुइयां पोर्टल पर भी दर्ज कर दिया गया, जो मामले को और गंभीर बनाता है।
बिना आदेश ऑनलाइन एंट्री, सिस्टम की सुरक्षा पर भी सवाल

सबसे गंभीर बात यह है कि इतने बड़े बदलाव बिना किसी वैध प्रशासनिक आदेश के ऑनलाइन पोर्टल पर अपडेट कर दिए गए। इससे न सिर्फ संबंधित पटवारी की भूमिका संदिग्ध होती है, बल्कि पूरे डिजिटल सिस्टम की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
कलेक्टर की सख्ती, पटवारी दीपक सिंह तत्काल निलंबित
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर कुणाल दुदावत ने तत्काल प्रभाव से पटवारी दीपक कुमार सिंह को निलंबित कर दिया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह कार्रवाई शासकीय कार्यों में घोर लापरवाही और अनियमितताओं के चलते की गई है।
नियमों का उल्लंघन, सिविल सेवा आचरण के तहत कार्रवाई
जांच प्रतिवेदन में यह पाया गया कि संबंधित पटवारी ने अपने पदीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए गंभीर अनियमितताएं की हैं, जो छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 और वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील नियम 1966 का स्पष्ट उल्लंघन है। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय तहसील पसान निर्धारित किया गया है।
किसके इशारे पर हुआ खेल, अब भी बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर इतनी बड़ी हेराफेरी किसके इशारे पर की गई। क्या यह सिर्फ एक कर्मचारी की करतूत है या इसके पीछे किसी बड़े नेटवर्क की भूमिका है। यह भी जांच का विषय है कि इस गड़बड़ी से आखिर किसे फायदा पहुंचाया जाना था।
कोरबा में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
कोरबा जिला पहले भी जमीन घोटालों को लेकर चर्चा में रहा है, खासकर आदिवासी और शासकीय जमीनों में छेड़छाड़ के मामलों में। कई बार शिकायतें सामने आईं, लेकिन कार्रवाई सीमित ही रही, जिससे ऐसे मामलों को बढ़ावा मिलने की आशंका बनी रही।
अब निगाहें आगे की जांच और बड़ी कार्रवाई पर
फिलहाल पटवारी के निलंबन के बाद अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में व्यापक जांच होगी और क्या अन्य जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाएगी। साथ ही यह भी देखना होगा कि प्रभावित जमीनों के रिकॉर्ड को सही करने की प्रक्रिया कब और कैसे शुरू होती है।









